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नैनीताल में कपल ने प्लास्टिक की 26 हजार बोतलों से बनाया शानदार होमस्टे

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नई दिल्ली: हम आगे बढ़ रहे हैं। कामयाब हो रहे हैं लेकिन पर्यावरण पीछे हो रहा है। धरती ने मनुष्य को जीने के लिए खुला आसमान दिया लेकिन मनुष्य ने आगे बढ़ने के लिए धरती का ही गला घोंट दिया। सोचिए अगर पर्यावरण ही नहीं होगा तो ये कामयाबी किस काम की। हम ये लिख पा रहे हैं क्योंकि किसी ने ऐसा काम किया है जो एक प्रेरणा बन सकता है। क्या आप सोच सकते हैं कि खराब प्लास्टिक की बोतलों से कोई घर बना सकता है। तो सोचिए अगर इन प्लास्टिक की बोतलों का सही इस्तेमाल होने लग जाए तो पर्यावरण को काफी हद तक बचाया जा सकता है।

उत्तर प्रदेश के रहने वाले दीप्ति शर्मा और पति अभिषेक शर्मा उत्तराखंड के सैर करने के लिए पहुंचते थे। उन्हें पहाड़ के वातावरण में छुट्टी बिताना बेहद आनन्दमय लगता था लेकिन उन्होंने देखा कि हरियाली और वातावारण की बाते हर कोई कर रहा है। उसका इस्तेमाल भी हो रहा है लेकिन उसे बचाना कोई नहीं चाहता है।

क्या आपकों को पता है पर्यावरण का सबसे बड़ा दुश्मन है प्लास्टिक जिसका व्यापार करीब 7-9 दशकों से हो रहा है। एक रिपोर्ट की मानें तो 1950 के दशक से, हमने 8.5 बिलियन टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन किया है। वर्तमान में, लगभग 60 प्रतिशत प्लास्टिक लैंडफिल में जाती है। इनका इस्तेमाल इतना बढ़ गया है कि माइक्रोप्लास्टिक संभवतः हमारे भोजन में भी पाए जाते हैं।

प्लास्टिक को रिसाइकिल कर दीप्ति शर्मा और अभिषेक शर्मा ने कमाल का काम किया और एक संदेश सभी को दे दिया । उन्होंने नैनीताल जिले के हरटोला गाँव में प्लास्टिक की बोतलों से एक होमस्टे बना डाला। इस होमस्टे को बनाने में उन्होंने कुल 26 हजार प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल किया है। इन बोतलों को पैच में तैयार किया गया और फिर इन्हें दीवार बनाने के लिए जोड़ दिया गया। दीवार को सख्त करने के लिए लगभग 100 प्लास्टिक की बोतलों को एक दूसरे से बांध दिया गया और जाल के तार से कवर कर दिया गया। ये दीवार तापमान को भी कंट्रोल करती है। चार कमरों के होमस्टे में दीप्ति और अभिषेक ने फर्श पर पुराने टायरों का इस्तेमाल किया। कमरे में जो लैंप रखे गए हैं वह व्हिस्की की बोतलों से तैयार किए गए हैं।

दीप्ति शर्मा एक शिक्षिका हैं। वह बताती है कि पहाड़ों में घूमने का शौक पहले से था। हम ट्रैक पर निकलते थे तो कूड़ा देखते थे, मन उदास होता था। लोग प्लास्टिक का इस्तेमाल करते हैं और उसे फेंक देते हैं। हमारा मानना है कि या तो लोगों को पहाड़ों में प्लास्टिक को रीसाइकल करना चाहिए और इस प्रोजेक्ट को शुरू किया। प्लास्टिक के दोबारा इस्तेमाल ने रुपए भी बचाए। दीप्ति ने अभिषेक के साथ घर बनाया है ताकि लोगों को प्लास्टिक के इस्तेमाल से बचने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। उनका कहना है कि पहाड़ों में प्लास्टिक के इस्तेमाल ने घरों, छोटी दुकानों और यहां तक कि शौचालयों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

कैसे हुई शुरुआत

अभिषेक शर्मा ने बताया कि इसकी शुरुआत 2016 में हुई। 2016 में लैंसडाउन की यात्रा के दौरान, हमने फैसला किया कि हम नोएडा या गाजियाबाद में नहीं बल्कि पहाड़ों में एक घर बनाना चाहते हैं। तब हमने इस प्रोजेक्ट की योजना शुरू की और हमने 2017 में जमीन खरीदी और काम शुरू किया। हमने फरवरी 2017 में घर बनाना शुरू किया और पूरी जगह बनाने में हमें लगभग डेढ़ साल लग गए। हम लगातार अपने होम स्टे में बदलाव कर रहे हैं। उनका अगला लक्ष्य पानी को बचाने को लेकर जागरूकता फैलाना है। इसके लिए वह 10,000 लीटर का एक रेन हार्वेस्टिंग मॉडल डेवलप कर रहे हैं। दोनों कपल 3-4 महीने में एक बार अपने होम स्टे में पहुंचते हैं। उन्होंने होमस्टे में रुकने वाले लोगों के लिए प्लास्टिक एकत्र करने पर छूट भी रखी हुई है, ताकि इस मुहिम को आगे बढ़ाया जा सकें।

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